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कागजों में ‘निजी’, मौके पर ‘जंगल’: सफेदे के चंद कतरों ने बदल दिया सरकारी जमीन का मालिक! बेबी लता और शंकर प्रजापति पर करोड़ों के घोटाले का आरोप..?

​राजस्व विभाग की मौन स्वीकृति या मिलीभगत? एक ही जमीन के बने दो ‘मिशल’, रसूखदारों को बचाने के लिए दबाई गई फाइल

​गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। क्या कोई सोच सकता है कि दशकों से जो जमीन सरकारी रिकॉर्ड में “जंगल” दर्ज हो, उस पर सफेद स्याही (सफेदा) फेरकर रातों-रात उसे निजी संपत्ति बना दिया जाए? जी हां, तहसील सकोला के ग्राम सेखवा में कुछ ऐसा ही दुस्साहसिक खेल खेला गया है। यह सिर्फ एक जमीन का घोटाला नहीं है, बल्कि राजस्व तंत्र की उस सड़ी-गली व्यवस्था का जीता-जागता सबूत है, जहां चंद रुपयों और रसूख के आगे सिस्टम नतमस्तक हो जाता है। ​इस बहुचर्चित ‘जंगल मद’ जमीन घोटाले में बेबी लता और शंकर प्रजापति का नाम मुख्य रूप से सामने आ रहा है, जिन्होंने कथित तौर पर प्रशासन की नाक के नीचे करोड़ों का खेल कर डाला।

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​घोटाले के मुख्य बिंदु: एक नज़र में :-

​>• कागजी जादूगरी-: मिशल रिकॉर्ड से ‘मध्यप्रदेश शासन’ का नाम सफेदे से मिटाया गया।

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​>• डबल गेम-: एक ही खसरा नंबर (1408) के दो से तीन अलग-अलग मिशल (रिकॉर्ड) तैयार किए गए।

>• ​करोड़ों का खेल-: इसी विवादित और फर्जी जमीन के कागजों पर बेमेतरा के IDFC बैंक से करोड़ों का लोन निकाल लिया गया।

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>• ​सिस्टम का संरक्षण-: 29 दिसंबर 2023 की पुख्ता शिकायत के बावजूद आज तक कोई एफआईआर नहीं, उल्टे फाइल ही गायब कर दी गई।

>• ​सफेदे का कमाल-: ऐसे गायब हुआ ‘मध्यप्रदेश शासन’

​मामला ग्राम सेखवा के खसरा नंबर 1408 की 25.54 एकड़ “बड़े झाड़ जंगल मद” की भूमि का है। 1954-55 के अधिकार अभिलेख (खाता क्रमांक 344) से लेकर 1999-2000 तक के राजस्व रिकॉर्ड चीख-चीख कर गवाही देते हैं कि यह जमीन सरकारी है। लेकिन भू-माफियाओं ने सरकारी मिशल में लाल स्याही और सफेदे का ऐसा खेल खेला कि ‘मध्यप्रदेश शासन’ का नाम मिटाकर निजी लोगों को मालिक बना दिया गया। इसी कूट रचना के तहत मूल खसरे के एक हिस्से 1408/1/2 (16.36 एकड़) को ईश्वरदीन और ददुवा के नाम पर चढ़ा दिया गया। ताज्जुब की बात यह है कि मौके पर आज भी वन विभाग द्वारा लगाए गए नीलगिरी और साल के ऊंचे पेड़ खड़े हैं, लेकिन फाइलों में यह जमीन ‘निजी’ हो चुकी है।

​बैंक से करोड़ों का लोन, घोटाले का ‘मास्टरस्ट्रोक’ :-

​खेल सिर्फ जमीन हथियाने तक सीमित नहीं रहा। साल 2025 में इस विवादित और फर्जी तरीके से हथियाई गई जमीन को बेमेतरा स्थित IDFC बैंक की शाखा में गिरवी रख दिया गया और इस पर करोड़ों रुपये का लोन पास करा लिया गया। यह सीधे तौर पर बैंक धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग की ओर भी इशारा करता है। आखिर बैंक ने बिना भौतिक सत्यापन (Physical Verification) किए जंगल की जमीन पर करोड़ों का लोन कैसे दे दिया?

​शिकायत के 15 महीने बाद भी कार्रवाई ‘शून्य’, क्यों?

​29 दिसंबर 2023 को कलेक्टर कार्यालय में इस पूरे फर्जीवाड़े की सबूतों के साथ शिकायत की गई थी। शिकायतकर्ता ने एक-एक बिंदु, पुराने रिकॉर्ड और दो अलग-अलग मिशल की कॉपियां तक प्रशासन को सौंप दीं। इसके बावजूद 2024 भर फाइलें एक टेबल से दूसरी टेबल धूल फांकती रहीं। ​सूत्रों की मानें तो इस पूरे खेल में कई राजस्व अधिकारियों की गर्दन फंस रही है। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि एक “टॉप महिला अफसर” के कनेक्शन और मोटी रकम के लेनदेन ने इस फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। डर यह है कि अगर निष्पक्ष जांच हुई, तो कई सफेदपोशों और बड़े अधिकारियों को जेल की हवा खानी पड़ सकती है।

​अब उठ रहे हैं ये सुलगते सवाल-:

​दशकों पुरानी सरकारी जमीन के मिशल रिकॉर्ड में सफेदा लगाने की हिम्मत किसने और किसके आदेश से की इतने पुख्ता साक्ष्य (दो अलग-अलग मिशल) होने के बावजूद प्रशासन ने अब तक बेबी लता, शंकर प्रजापति और संबंधित अधिकारियों पर FIR दर्ज क्यों नहीं की ​क्या प्रशासन इस मामले में उच्चस्तरीय जांच बैठाकर जमीन को पुनः वन विभाग और शासन के नाम दर्ज करने का साहस दिखाएगा ​यह ग्राम सेखवा का अकेला मामला नहीं है, बल्कि पूरे राजस्व विभाग के मुंह पर एक तमाचा है। अब देखना यह है कि प्रशासन भ्रष्टाचारियों पर हथौड़ा चलाता है या फिर यह मामला भी ‘सिस्टम’ की गहरी खाइयों में हमेशा के लिए दफन हो जाएगा।

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